अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के शोध आयाम के विद्यार्थियों ने ओ. पी. बब्बर, राजकुमार सपरा एवं राजन ढींगरा से किया संवाद
भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में आपातकाल (1975–77) केवल एक संवैधानिक प्रावधान का प्रयोग नहीं था; वह भारतीय लोकतंत्र की आत्मा पर किया गया एक गहरा प्रहार था। उस कालखंड में असहमति को अपराध बना दिया गया, प्रेस पर नियंत्रण स्थापित हुआ, विपक्षी नेताओं और कार्यकर्ताओं को जेलों में डाल दिया गया, और शासन-तंत्र को इस प्रकार प्रयुक्त किया गया मानो लोकतंत्र जनता की शक्ति नहीं, सत्ता की संपत्ति हो। आज, जब नई पीढ़ी स्वतंत्र वाणी, संगठन की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक अधिकारों को स्वाभाविक मानकर आगे बढ़ रही है, तब यह अनिवार्य हो जाता है कि उसे बताया जाए कि इन अधिकारों की रक्षा के लिए कितने लोगों ने अपनी आजीविका, संपत्ति, सम्मान, पारिवारिक स्थिरता और जीवन की शांति तक दाँव पर लगा दी थी।
इसी ऐतिहासिक चेतना को केंद्र में रखकर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के शोध आयाम के अंतर्गत आपातकाल पर गंभीर शोध कर रहे विद्यार्थियों ने अपने अध्ययन के अंतिम चरण में लोकतंत्र-युग के जीवित साक्षियों से विस्तृत संवाद किया। इस क्रम में राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्री ओ. पी. बब्बर, लोकतंत्र सेनानी संघ (दिल्ली प्रदेश) के महामंत्री श्री राजकुमार सपरा तथा दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष श्री राजन ढींगरा से आत्मीय और गंभीर साक्षात्कार किए गए। यह केवल औपचारिक बातचीत नहीं थी; यह उस पीढ़ी के संघर्ष, अपमान, आर्थिक विनाश, मनोबल और लोकतंत्र-निष्ठा को समझने का एक गंभीर प्रयास था, जिसने अपने जीवन से यह सिद्ध किया कि लोकतंत्र केवल संवैधानिक शब्द नहीं, बल्कि जन-आस्था का जीवित संकल्प है।
आपातकाल की पृष्ठभूमि में गुजरात का छात्र आंदोलन, बिहार में उभरती युवा बेचैनी, और लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में आकार लेता जनांदोलन था। भ्रष्टाचार, सत्ता-अहंकार, प्रशासनिक दमन और राजनीतिक अनैतिकता के विरुद्ध देश का छात्र-युवा वर्ग एक नैतिक नेतृत्व की खोज में था। इसी पृष्ठभूमि में जब 25 जून 1975 को आपातकाल लगाया गया, तब देश ने केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं देखा; उसने स्वतंत्र भारत में लोकतंत्र की श्वास रुकते हुए देखी। प्रेस पर पहरा बैठ गया, न्याय और असहमति पर दबाव बढ़ा, और जेलें उन लोगों से भर दी गईं जो राष्ट्रद्रोही नहीं, बल्कि लोकतंत्र-निष्ठ नागरिक थे।
शोधार्थियों से बातचीत में श्री ओ. पी. बब्बर ने आपातकाल की पीड़ा को अत्यंत मार्मिक शब्दों में व्यक्त किया। वे आगे चलकर सार्वजनिक जीवन में अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान तक पहुँचे और आठ बार विधायक बने, किंतु आपातकाल ने उनके जीवन को ऐसी चोट दी, जिसकी स्मृति आज भी हृदय को उद्वेलित कर देती है। उन्होंने विद्यार्थियों को बताया कि उस दौर में उनका सर्वस्व छिन गया। उनकी संपत्ति नष्ट हो गई, उनके तीन इलेक्ट्रॉनिक शोरूम बर्बाद हो गए, व्यापार समाप्त हो गया, और एक समय का समृद्ध, परिश्रमी और व्यवस्थित परिवार देखते-देखते संकट के गर्त में धकेल दिया गया। उन्होंने कहा कि परिवार पर उस समय लगभग पाँच लाख रुपये का कर्ज चढ़ गया था—और उस ऋण को चुकाने में पूरे ग्यारह वर्ष लग गए। जो परिवार कभी स्वाभिमान और समृद्धि के साथ खड़ा था, वही परिवार अचानक अभाव, अपमान और असुरक्षा के बीच जीवन बिताने को विवश हो गया। यह वर्णन केवल आर्थिक हानि का लेखा नहीं था; वह उस दमनकारी व्यवस्था का जीवित दस्तावेज था, जो व्यक्ति को केवल जेल में नहीं डालती, बल्कि उसके घर, उसकी आजीविका, उसके आत्मविश्वास और उसके भविष्य को भी घायल कर देती है।
श्री राजकुमार सपरा ने संवाद में यह रेखांकित किया कि आपातकाल की पीड़ा को केवल गिरफ्तारी और कारावास के संदर्भ में नहीं समझा जा सकता। उस काल में असंख्य लोगों को मीसा और डी.आई.आर. जैसी धाराओं के अंतर्गत बंदी बनाया गया। अनेक लोकतंत्र सेनानियों को जेलों में मानसिक, सामाजिक और प्रशासनिक स्तर पर तोड़ने का प्रयास किया गया। परिवारों से संपर्क बाधित हो जाता था, समाचारों से दूरी बना दी जाती थी, अपमानजनक व्यवहार सामान्य बना दिया जाता था, और भविष्य को अनिश्चितता के अंधकार में धकेल दिया जाता था। श्री सपरा ने कहा कि नई पीढ़ी को यह अवश्य जानना चाहिए कि लोकतंत्र की रक्षा केवल संसद या न्यायालय नहीं करते; कभी-कभी उसे बचाने का भार उन सामान्य नागरिकों के कंधों पर आ जाता है, जो अन्याय के सामने झुकने से इंकार कर देते हैं।
दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष श्री राजन ढींगरा ने इस शोध-प्रयास के महत्त्व पर बल देते हुए कहा कि आपातकाल का सत्य केवल स्मारकों, भाषणों या सीमित स्मृतियों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यह नई पीढ़ी के शैक्षिक, वैचारिक और राष्ट्रीय संस्कार का अंग बनना चाहिए। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र सेनानियों का संघर्ष केवल अतीत की गौरव-कथा नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य दोनों के लिए चेतावनी है। यदि युवा पीढ़ी यह नहीं समझेगी कि सत्ता-संरक्षण के लिए किस प्रकार लोकतंत्र का गला घोंटा जा सकता है, तो उसका लोकतांत्रिक बोध अधूरा रह जाएगा। उन्होंने इस शोध-दल की गंभीरता, अनुशासन और संवेदनशीलता की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे प्रयत्न लोकतंत्र की स्मृति को पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रखने का कार्य करते हैं।
इस पूरे शोध-प्रयास की एक विशेष शक्ति यह भी है कि इसमें दिल्ली के प्रमुख उच्च शिक्षण संस्थानों—जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU), दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) और जामिया मिल्लिया इस्लामिया—के छात्र-शोधार्थी सक्रिय रूप से जुड़े हुए हैं। इस कार्य में आदर्श कुमार सिंह संयोजक, राममूरत उपाध्याय सह-संयोजक तथा आदित्य नाथ तिवारी समन्वयक के रूप में दायित्व निभा रहे हैं। शोध-इंटर्न के रूप में संचिता शर्मा, श्रेयसी, हिमांशी, निधि, दिव्या, अंविता महाजन, रिद्धिराज शुक्ला, मयंक, गोपाल, रितिका, रितिका शर्मा, निकिता यादव, आफरीन और नव्या सक्रिय सहयोग दे रहे हैं। साथ ही, शोध फाउंडेशन के कार्यकर्ता वैभव वर्मा, अजीव प्रकाश, कीर्ति तिवारी, अपर्णा, रामानंद, अतुल मौर्य तथा रत्ना त्रिपाठी भी इस शोध-कार्य को प्रमाणिक, व्यवस्थित और व्यापक बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
इस पहल के संचालन और बौद्धिक मार्गदर्शन में दिल्ली राज्य शोध प्रमुख श्री प्रशांत शाही की भूमिका भी विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उनके मार्गदर्शन में शोध-दल ने विषय को केवल तिथि-आधारित राजनीतिक घटना के रूप में नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक चेतना, मानवीय पीड़ा और राष्ट्रीय स्मृति के रूप में समझने का प्रयास किया। यही कारण है कि यह शोध केवल सूचना-संग्रह का उपक्रम नहीं रह गया, बल्कि इतिहास के जीवित स्रोतों और नई पीढ़ी के बीच एक सजीव सेतु बन गया है।
इस संवाद की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि शोधार्थियों ने आपातकाल को केवल आदेशों, अधिसूचनाओं और संवैधानिक प्रावधानों के माध्यम से नहीं, बल्कि मनुष्य की पीड़ा, परिवार की टूटन, समाज के भय और लोकतंत्र के पुनर्जन्म के रूप में समझा। जब वे श्री ओ. पी. बब्बर जैसे भुक्तभोगी से सुनते हैं कि कैसे तीन शोरूम नष्ट हो गए, परिवार कर्ज में डूब गया, और ग्यारह वर्षों तक ऋण का बोझ ढोना पड़ा, तब आपातकाल उनके लिए केवल इतिहास की तिथि नहीं रह जाता; वह राष्ट्रीय स्मृति का स्पंदित अध्याय बन जाता है।
फिर भी इस समूचे अंधकार में जो सबसे उज्ज्वल तत्व उभरकर सामने आता है, वह है—लोकतंत्र सेनानियों की अदम्य आस्था। उन्होंने प्रतिशोध का मार्ग नहीं चुना, हिंसा का सहारा नहीं लिया, और निराशा को अंतिम सत्य नहीं माना। उन्होंने जेल, दमन, अपमान, आर्थिक विनाश और सामाजिक पीड़ा सब कुछ सहा, किंतु लोकतंत्र में अपना विश्वास नहीं खोया। यही विश्वास अंततः लोकतंत्र की पुनर्स्थापना का कारण बना।
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के शोध आयाम द्वारा किया जा रहा यह प्रयास इसलिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यह नई पीढ़ी को केवल इतिहास नहीं, इतिहास की संवेदना सिखा रहा है। यह शोध बताता है कि लोकतंत्र की रक्षा केवल संवैधानिक संस्थाएँ नहीं करतीं; उसे वे मनुष्य बचाते हैं, जो अन्याय के सामने झुकने से इंकार कर देते हैं। आपातकाल की स्मृति को जीवित रखना इसलिए आवश्यक है, ताकि राष्ट्र भविष्य में कभी भी उस अंधकार की पुनरावृत्ति को सामान्य या स्वीकार्य न मान ले। यही इस शोध-प्रयास की सबसे बड़ी सार्थकता और लोकतंत्र के प्रति उसकी सबसे बड़ी सेवा है।
रिपोर्टर
पूजा तिवारी






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