भारत की आत्मा का पुनर्जागरण
भारत की सनातन ज्ञान-परंपरा, वेदाङ्ग ज्योतिष की गौरवशाली विरासत तथा आधुनिक वैज्ञानिक चेतना के अद्वितीय समन्वय का साक्षी बना ‘राष्ट्रीय ज्योतिष महाकुंभ ज्योतिषीय-सांस्कृतिक महोत्सव 2026 । नई दिल्ली स्थित संविधान क्लब में संपन्न इस भव्य आयोजन ने यह प्रतिपादित किया कि ज्योतिष कोई अंधविश्वास नहीं, अपितु भारत की वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक चेतना की सजीव और शाश्वत परंपरा है।
इस विराट मंच पर राष्ट्रजीवन के विविध आयामों का प्रतिनिधित्व करने वाले राजनेता, मंत्री, विधायक, प्रख्यात ज्योतिषाचार्य, वैज्ञानिक दृष्टिकोण से अनुसंधान करने वाले विद्वान तथा सनातन संस्कृति के साधक एकत्रित हुए। यह आयोजन वस्तुतः परंपरा और विज्ञान के मध्य सेतु-संरचना का ऐतिहासिक प्रयास सिद्ध हुआ।
“ज्योतिषं मूर्ध्नि स्थितम्” — वेदाङ्गों का शिरोमणि
यथा शिखा मयूराणां नागानां मणयो यथा।
तद्वेदाङ्गशास्त्राणां ज्योतिषं मूर्ध्नि स्थितम्॥
जिस प्रकार मयूर के मस्तक पर शिखा और नाग के फण पर मणि सर्वोच्च स्थान धारण करती है, उसी प्रकार समस्त वेदाङ्गों में ज्योतिष का स्थान सर्वोपरि है। इसी उद्घोष के साथ महोत्सव का शुभारम्भ अत्यंत गरिमामय वातावरण में संपन्न हुआ।
दीप-प्रज्ज्वलन — ज्ञान-ज्योति का प्राकट्य
कार्यक्रम का शुभारम्भ भव्य दीप-प्रज्ज्वलन समारोह द्वारा हुआ। मयूराकृति पीतल के दीपाधार पर समस्त विशिष्ट अतिथियों ने सामूहिक रूप से दीप प्रज्वलित किया। यह दृश्य केवल एक परंपरागत अनुष्ठान नहीं था, अपितु सहस्राब्दियों से प्रवाहित भारतीय ज्ञान-धारा के पुनः आलोकित होने का प्रतीक था।
उस क्षण उपस्थित प्रत्येक व्यक्तित्व के मुखमण्डल पर गौरव, श्रद्धा एवं आत्मिक उत्साह का अद्भुत समन्वय दृष्टिगोचर हो रहा था। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो प्राचीन भारत की ऋषि-परंपरा आधुनिक युग में पुनः जागृत हो रही हो।
मुख्य अतिथि — राष्ट्रीय नेतृत्व का संगम
इस ऐतिहासिक आयोजन में देश के उच्च राजनीतिक एवं सामाजिक नेतृत्व की गरिमामयी उपस्थिति ने इसे एक वास्तविक राष्ट्रीय महोत्सव का स्वरूप प्रदान किया।
⭐ माननीय अश्विनी कुमार चौबे — पूर्व केंद्रीय राज्य मंत्री
⭐ श्री हर्ष मल्होत्रा — केंद्रीय राज्य मंत्री
⭐ श्री विजेंद्र कुमार गुप्ता — विधायक, दिल्ली
मुख्य अतिथि उद्बोधन — माननीय अश्विनी कुमार चौबे

माननीय अश्विनी कुमार चौबे ने अपने उद्बोधन में कहा—
“मैं यहाँ एक सामान्य कार्यक्रम में सम्मिलित होने की भावना से आया था, किंतु यहाँ पहुँचकर यह अनुभूति हुई कि यह भारत की आत्मा का जागरण है। यह केवल सम्मेलन नहीं, अपितु सहस्राब्दियों की ज्ञान-परंपरा का पुनर्जन्म है।”
आर्यभट्ट सहस्र वर्ष पूर्व की वैज्ञानिक चेतना
उन्होंने प्रश्न किया कि जब यूरोप अंधकार युग में था और गैलीलियो को अपने वैज्ञानिक मतों के कारण कारावास सहना पड़ा, तब भारत क्या कर रहा था? उत्तर स्पष्ट है—
४९९ ईस्वी में आर्यभट्ट ने यह उद्घोष किया कि पृथ्वी अपनी धुरी पर परिभ्रमण करती है। उन्होंने π का मान ३.१४१६ निकाला तथा पृथ्वी की परिधि ३९,९६८ किलोमीटर निर्धारित की। आधुनिक वैज्ञानिक संस्थाओं द्वारा मापा गया मान ४०,०७५ किलोमीटर है अंतर अत्यंत न्यून।
यह तथ्य इस बात का प्रमाण है कि भारत में वैज्ञानिक चिंतन सहस्रों वर्ष पूर्व अत्यंत उन्नत स्तर पर विद्यमान था।
सूर्य सिद्धान्त, वराहमिहिर एवं ब्रह्मगुप्त
‘सूर्य सिद्धान्त’ में पृथ्वी के अक्षीय झुकाव को २३°५८’ बताया गया है, जबकि आधुनिक मान २३°२७’ है अंतर अत्यल्प।
वराहमिहिर ने ‘पञ्चसिद्धान्तिका’ के माध्यम से ग्रहणों की गणना का सशक्त आधार प्रस्तुत किया।
ब्रह्मगुप्त ने ६२८ ईस्वी में शून्य एवं ऋणात्मक संख्याओं का प्रतिपादन किया, जिसके बिना आधुनिक गणित एवं संगणक विज्ञान की कल्पना असंभव है।
रामचरितमानस खगोलीय साक्ष्य
“नवमी तिथि मधुमास पुनीता, शुक्ल पक्ष अभिजित हरि प्रीता।”
उन्होंने कहा कि आधुनिक खगोल-गणना सॉफ्टवेयर द्वारा जब इस विवरण का परीक्षण किया गया, तो यह वर्णन पूर्णतः यथार्थ सिद्ध हुआ। यह हमारे ग्रंथों की वैज्ञानिकता का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
चंद्रयान-३ से आदित्य-एल१ तक
२३ अगस्त २०२३ को भारत ने चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर सफलतापूर्वक अवतरण कर इतिहास रच दिया।
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ने एक ही प्रक्षेपण में १०४ उपग्रह स्थापित कर विश्व कीर्तिमान स्थापित किया।
आदित्य-एल१ मिशन सूर्य के अध्ययन में संलग्न है वही सूर्य जिसकी उपासना हमारे ऋषियों ने सहस्रों वर्ष पूर्व की।
उन्होंने कहा कि भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था तीव्र गति से विकसित हो रही है तथा २०३३ तक ४४ अरब डॉलर के लक्ष्य की ओर अग्रसर है।
“विकसित भारत २०४७ के संकल्प के अंतर्गत नवीन शिक्षा नीति में भारतीय ज्ञान-प्रणाली को स्थान देना एक ऐतिहासिक परिवर्तन है।”
श्री हर्ष मल्होत्रा का उद्बोधन

श्री हर्ष मल्होत्रा ने अपने उद्बोधन में ज्योतिष को भारत की सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न एवं अविभाज्य अंग बताते हुए कहा कि यह विद्या केवल भविष्यकथन तक सीमित नहीं है, अपितु मानव जीवन के विविध आयामों कृषि, नौपरिवहन, चिकित्सा, स्थापत्य, सामाजिक संरचना एवं दैनिक निर्णय-प्रक्रिया का मार्गदर्शन करने वाली एक सुव्यवस्थित एवं वैज्ञानिक परंपरा रही है।
उन्होंने अत्यंत विनम्रता के साथ यह स्पष्ट किया कि—
“मैं स्वयं ज्योतिषी नहीं हैं , न ही इस विद्या का विद्वान होने का दावा करता हूँ; तथापि एक सामान्य भारतीय, एक सनातन परंपरा से जुड़े नागरिक के रूप में मैं यह अनुभव करता हूँ कि ज्योतिष किसी एक वर्ग या विशेषज्ञ तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जनजीवन में गहराई तक रची-बसी परंपरा है।”
उन्होंने आगे कहा कि भारत के अधिकांश सनातनी परिवार किसी न किसी रूप में चाहे वह शुभ मुहूर्त का निर्धारण हो, विवाह, गृहप्रवेश, यात्रा, यज्ञ-अनुष्ठान अथवा अन्य सामाजिक-सांस्कृतिक निर्णय ज्योतिषीय परामर्श का सहारा लेते हैं। यह परंपरा केवल आस्था का विषय नहीं, अपितु एक सामूहिक सांस्कृतिक व्यवहार का अंग बन चुकी है।
उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि ज्योतिष का प्रभाव केवल व्यक्तिगत जीवन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका उपयोग व्यापक स्तर पर, विशेषतः राजनीतिक एवं सामाजिक निर्णयों में भी परोक्ष अथवा प्रत्यक्ष रूप से दृष्टिगोचर होता है। अनेक अवसरों पर महत्वपूर्ण निर्णयों, कार्यक्रमों के आयोजन, चुनावी रणनीतियों एवं सार्वजनिक गतिविधियों में समय-निर्धारण के लिए ज्योतिषीय आधार का सहारा लिया जाता है। यह इसकी व्यापक स्वीकृति एवं प्रासंगिकता का प्रमाण है।
उन्होंने कहा—
“ज्योतिष वह सशक्त सेतु है, जो हमारे गौरवशाली अतीत की बौद्धिक एवं वैज्ञानिक उपलब्धियों को वर्तमान की आधुनिक वैज्ञानिक कसौटी से जोड़ने का कार्य करता है। यह केवल परंपरा नहीं, अपितु एक सतत विकसित होती ज्ञान-प्रणाली है, जिसे समुचित अध्ययन, अनुसंधान एवं तर्कसंगत दृष्टिकोण के साथ आगे बढ़ाया जाना चाहिए।”
अपने उद्बोधन में उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भारत सरकार भारतीय ज्ञान-परंपरा के संरक्षण, संवर्धन एवं वैश्विक स्तर पर प्रसार के लिए पूर्णतः प्रतिबद्ध है। उन्होंने बल दिया कि प्राचीन ज्ञान को आधुनिक अनुसंधान, प्रौद्योगिकी एवं शिक्षा प्रणाली के साथ समन्वित कर उसे नई पीढ़ी तक पहुँचाना समय की आवश्यकता है।
अंततः उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि यदि ज्योतिष को वैज्ञानिक दृष्टिकोण, प्रामाणिक अध्ययन एवं संस्थागत संरचना के माध्यम से विकसित किया जाए, तो यह न केवल भारत की सांस्कृतिक अस्मिता को सुदृढ़ करेगा, बल्कि वैश्विक ज्ञान-विमर्श में भी भारत को एक विशिष्ट एवं सम्मानित स्थान प्रदान करेगा।
श्री विजेंद्र कुमार गुप्ता का उद्बोधन

श्री विजेंद्र कुमार गुप्ता ने अपने उद्बोधन में अत्यंत गंभीर एवं दार्शनिक स्वर में कहा—
“हमारे पूर्वजों ने जब आकाश का अवलोकन किया, तब उनका उद्देश्य केवल नक्षत्रों की गणना करना नहीं था, अपितु उन्होंने उस विराट आकाश में जीवन के गूढ़तम रहस्यों का अन्वेषण किया। उन्होंने ब्रह्माण्ड और मानव के मध्य उस सूक्ष्म संबंध को पहचाना, जो आज भी हमारे अस्तित्व का आधार है। ज्योतिष वस्तुतः वह दिव्य विद्या है, जो मानव के अंतर्मन को इस असीम ब्रह्माण्ड के व्यापक विस्तार से जोड़ने का कार्य करती है। यह केवल ग्रह-नक्षत्रों की गति का अध्ययन नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन, काल-बोध और सृष्टि-तत्व की अनुभूति का माध्यम है।”
उन्होंने आगे कहा कि आज आवश्यकता इस बात की है कि इस महान विद्या को उसके वास्तविक स्वरूप में पुनः प्रतिष्ठित किया जाए। समाज में प्रचलित भ्रांतियों, अज्ञानजनित धारणाओं तथा अपूर्ण ज्ञान के आधार पर किए जा रहे दुरुपयोग से ज्योतिष की गरिमा को आघात पहुँचता है।
इसी संदर्भ में उन्होंने एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रस्ताव रखते हुए कहा कि—
ज्योतिष के क्षेत्र में एक सुसंगठित एवं पारदर्शी तंत्र (व्यवस्था) का निर्माण किया जाना चाहिए, जिसके माध्यम से यह सुनिश्चित किया जा सके कि केवल वही व्यक्ति इस विद्या के अभ्यास एवं परामर्श के लिए अधिकृत हों, जिनके पास समुचित, प्रमाणिक एवं गहन ज्ञान हो।
उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि—
“अल्पज्ञ, अर्धशिक्षित अथवा बिना विधिवत अध्ययन एवं प्रशिक्षण के इस क्षेत्र में सक्रिय व्यक्तियों को नियंत्रित करने हेतु एक मानकीकृत प्रणाली विकसित करना समय की अनिवार्यता है। इससे न केवल ज्योतिष की प्रतिष्ठा सुरक्षित रहेगी, बल्कि जनसामान्य का विश्वास भी सुदृढ़ होगा।”
उन्होंने सुझाव दिया कि इसके लिए—
→ प्रमाणन (Certification) की स्पष्ट व्यवस्था हो
→ प्रशिक्षण एवं शोध-आधारित मानक निर्धारित किए जाएँ
→ योग्य विद्वानों को ही आधिकारिक मान्यता प्रदान की जाए
→ तथा एक नियामक तंत्र के माध्यम से इस विद्या की शुद्धता एवं विश्वसनीयता सुनिश्चित की जाए
अपने उद्बोधन के समापन में उन्होंने यह भी घोषणा की कि दिल्ली में ज्योतिष, वास्तु एवं वैदिक विज्ञान के उन्नत अनुसंधान केंद्रों की स्थापना का संकल्प लिया जाय , जहाँ पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक वैज्ञानिक पद्धतियों के साथ समन्वित करते हुए अनुसंधान, प्रशिक्षण एवं नवाचार को प्रोत्साहित किया जाएगा।
उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि यदि इस दिशा में संगठित प्रयास किए जाएँ, तो ज्योतिष न केवल भारत में, बल्कि सम्पूर्ण विश्व में पुनः एक सम्मानित एवं वैज्ञानिक अनुशासन के रूप में प्रतिष्ठित हो सकता है।
दीप शिखा शर्मा — ज्योतिष से जनसेवा तक

सम्मान का गरिमामय क्षण
एस्ट्रो सांस्कृतिक महोत्सव के इस राष्ट्रीय मंच पर श्रीमती दीप शिखा शर्मा को Astro Conclave-2026 Certificate of Appreciation से सम्मानित किया गया। यह प्रतिष्ठित सम्मान स्थानीय विधायक एवं विशिष्ट अतिथि श्री विजेंद्र गुप्ता ने अपने कर-कमलों से प्रदान किया।
ज्योतिष साधना और सेवा का सेतु
श्रीमती शर्मा ने ज्योतिष को केवल भविष्यकथन का माध्यम नहीं माना, अपितु इसे सामाजिक चेतना और जन-कल्याण का साधन बनाया। महिला सशक्तीकरण, पारिवारिक सामंजस्य और मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में उन्होंने ज्योतिष-परामर्श को एक प्रभावी उपकरण के रूप में प्रयोग किया।
राजनीति में प्रवेश एक स्वाभाविक विस्तार
सामाजिक कार्यों में गहरी संलग्नता के फलस्वरूप उनका राजनीतिक क्षेत्र में कदम रखना स्वाभाविक ही था। ज्योतिष ने उन्हें धैर्य, विवेक और दीर्घदृष्टि दी और ये तीनों गुण एक सफल जनप्रतिनिधि के लिए अनिवार्य हैं।
“ज्ञान तब सार्थक होता है जब वह पुस्तकों से निकलकर जीवन में उतरे और जीवन तब सार्थक होता है जब वह समाज के लिए जिए।”
श्री अंकित जैन — एक प्रेरणादायी व्यक्तित्व

इस परिवर्तन के जीवंत प्रमाण हैं श्री अंकित जैन। जैन समुदाय में ASTRO ANKIT के नाम से एक प्रतिष्ठित ज्योतिषाचार्य के रूप में पहचाने जाते हैं। ज्योतिष कल्चरल कॉन्क्लेव 2026 में उन्हें गेस्ट ऑफ ऑनर ज्योतिषी के रूप में सम्मानित किया गया। वे व्यवसाय से चार्टर्ड अकाउंटेंट हैं, एक ऐसा Profession जो तर्क, अनुशासन और संख्या-विज्ञान की गहरी समझ माँगता है। किन्तु श्री जैन यहीं नहीं रुके। उनकी जिज्ञासा उन्हें वैदिक ज्योतिष की ओर ले गई और उन्होंने इस प्राचीन विद्या को उतनी ही गम्भीरता और समर्पण से आत्मसात किया जितनी लगन से उन्होंने अपनी व्यावसायिक शिक्षा ग्रहण की थी।
एक प्रतिष्ठित ज्योतिषाचार्य का यह दोहरा परिचय, आधुनिक वित्त-विशेषज्ञ और प्राचीन ज्ञान के अधिकारी विद्वान, इस बात का प्रमाण है कि सच्ची साधना किसी वर्ग विशेष तक सीमित नहीं होती।
सम्मान का यह क्षण
राष्ट्रीय ज्योतिष महाकुंभ के इस गरिमामय मंच पर श्री अंकित जैन को Astro Cultural Mahotsav के सुवर्ण सम्मान-पट्टिका से अलंकृत किया गया। माननीय मंत्रीगण, सांसद और विद्वत्जन की उपस्थिति में मिला यह सम्मान केवल एक व्यक्ति का नहीं, उस पूरी पीढ़ी का सम्मान है जो परम्परा और आधुनिकता के बीच सेतु बन रही है।
सन्देश
“विद्या वंश परंपरा से नहीं आती। जो साधना करे, ज्ञान उसी को वरण करता है।”
श्री अंकित जैन का यह जीवन-प्रसंग सनातन की आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मौन किन्तु सशक्त प्रेरणा है।
विशिष्ट अतिथि — ज्ञान के साधक
इस महोत्सव में देश के अनेक प्रख्यात ज्योतिषाचार्य, आध्यात्मिक संत एवं विद्वान उपस्थित रहे—
⭐ दाती महाराज
⭐ जी.डी. वशिष्ठ
⭐ डॉ. वाई. राखी
⭐ पार्थिक पांडे
⭐ मनोज जैन
⭐ केवल कपूर
⭐ विवेक त्रिपाठी
⭐ श्रीवर्धन त्रिवेदी
⭐ के.सी. विश्नोई
⭐ नवीन शर्मा
⭐ दीपांशु गिरि
⭐ प्रो. सुजाता शर्मा
इन विद्वानों ने ज्योतिष के विविध आयामों नक्षत्र विज्ञान, वास्तुशास्त्र, रत्नशास्त्र, कालगणना तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता के साथ इसके समन्वय पर गहन विचार प्रस्तुत किए।
महोत्सव का संदेश — राष्ट्रीय चेतना का अभियान
→ परंपरा एवं विज्ञान के समन्वय का अभियान
→ ज्योतिष को वैज्ञानिक आधार प्रदान करने का अभियान
→ आधुनिक तकनीक एवं कृत्रिम बुद्धिमत्ता को प्राचीन ज्ञान से जोड़ने का अभियान
→ भारत को पुनः विश्वगुरु के पद पर प्रतिष्ठित करने का अभियान
समापन संकल्प
→ हम अपनी प्राचीन ज्ञान-परंपरा का पुनरुत्थान करेंगे
→ उसे आधुनिक विज्ञान की कसौटी पर परखेंगे
→ और समस्त विश्व के कल्याण हेतु समर्पित करेंगे
ज्ञानं विज्ञान सहितं लोकहिताय प्रवर्तते
जब ज्ञान और विज्ञान का समन्वय होता है, तभी राष्ट्र वास्तविक प्रगति करता है।
आयोजन विवरण
कार्यक्रम का सफल एवं सुव्यवस्थित संचालन प्रदीप कुमार श्रीवास्तव एवं फ़ज़्ले गुफ़रान के कुशल निर्देशन में संपन्न हुआ। उनके प्रभावी समन्वय, सुसंगठित प्रस्तुति एवं मंच संचालन ने पूरे कार्यक्रम को गरिमामय, आकर्षक और यादगार बना दिया।
प्रायोजक — कुणाल वास्तु केंद्र (ज्योतिष एवं अनुसंधान संस्थान)
सह-प्रायोजक — राम रत्न समूह एवं जेम लैब







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