कौन लौटेगा, कौन नहीं: जब अश्विनी चौबे की यातना से जेल की दीवारें भी सिसक उठीं
भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में आपातकाल का कालखंड केवल घटनाओं का क्रम नहीं है; वह वेदना का वह अंधकार है, जिसमें मनुष्य की देह ही नहीं, उसकी आशा, उसका स्वाभिमान, उसकी निश्चिंतता और उसके घर-आँगन तक को कैद कर लिया गया था। उस समय जेलें केवल कारागार नहीं थीं; वे मौन चीखों की गूंज से भरे हुए ऐसे बंद कक्ष थे, जहाँ हर कराह किसी एक व्यक्ति की नहीं, पूरे लोकतंत्र की पीड़ा बन जाती थी। उस युग की कितनी ही कथाएँ इतिहास के पन्नों में सूखी पंक्तियों की तरह दर्ज हैं, पर जो लोग उस युग को जी आए, उनके हृदय में वे आज भी रक्त-सिक्त स्मृतियों की तरह धड़कती हैं। ऐसी ही एक कथा है—अश्विनी कुमार चौबे की यातना की कथा, एक ऐसी कथा, जिसमें भय इतना घना था कि सहबंदियों को लगने लगा था—अब शायद वे लौटेंगे नहीं।
यह वही अश्विनी कुमार चौबे थे, जो उस उभरती हुई छात्र-चेतना के अग्रिम पंक्ति के युवक थे, जिसने बिहार की धरती पर प्रश्न पूछना सीखा, अन्याय के सामने सिर झुकाने से इंकार किया और लोकनायक जयप्रकाश नारायण जैसे नैतिक पुरुष को छात्र-आकांक्षा का स्वर बनने के लिए पुकारा। पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ के शपथ-समारोह में जयप्रकाश नारायण को आने और विद्यार्थियों को संबोधित करने के लिए जिन पाँच प्रमुख लोगों ने आग्रह और प्रेरणा का वह ऐतिहासिक कार्य किया, उनमें अश्विनी कुमार चौबे भी थे। वह केवल निमंत्रण नहीं था; वह एक युग को दूसरे युग से जोड़ने वाला क्षण था। एक ओर अनुभवी लोकनायक, दूसरी ओर बेचैन युवा शक्ति—और उनके बीच एक पुल बनकर खड़े थे ऐसे ही कुछ युवक, जिनमें अश्विनी चौबे का नाम प्रमुख था।
किंतु इतिहास का क्रूर व्यंग्य देखिए—जिस युवक ने लोकतांत्रिक जागरण की मशाल थामी, वही युवक शीघ्र ही दमन की अंधेरी सुरंगों में धकेल दिया गया। आपातकाल लगते ही जैसे देश पर भय का ताला जड़ दिया गया। शब्दों पर पहरा बैठ गया, विचारों पर शिकंजा कस गया, असहमति को अपराध मान लिया गया। जेलों में बंद वे लोग थे, जिनका अपराध केवल इतना था कि वे लोकतंत्र में विश्वास करते थे। उन्हीं जेलों में अश्विनी चौबे भी थे। वहाँ दिन का प्रकाश भी कैद था और रात का अंधकार भी। कोई निश्चितता नहीं, कोई सुरक्षा नहीं, कोई आश्वासन नहीं। केवल प्रतीक्षा—और उस प्रतीक्षा के भीतर फैला हुआ एक लंबा, अथाह, शीतल भय।
फिर एक दिन वह हुआ, जिसने कारागार के भीतर बंद हृदयों को जड़ कर दिया। अश्विनी चौबे पर की गई प्रताड़ना इतनी भीषण, इतनी अमानवीय और इतनी लोमहर्षक थी कि सहबंदी कैदियों को लगने लगा—अब शायद वे जीवित नहीं बचेंगे। यातना-कक्ष से आती कराहें केवल ध्वनि नहीं थीं; वे मानो किसी मनुष्य के भीतर टूटती हुई हड्डियों, कुचले जाते हुए आत्मबल और झुलसते हुए प्राणों की प्रतिध्वनि थीं। जो साथी उन आवाज़ों को सुन रहे थे, वे चाहकर भी कुछ कर नहीं सकते थे। वे दीवारों के उस पार पड़े अपने एक साथी की वेदना को केवल सुन सकते थे, सह नहीं सकते थे; कल्पना कर सकते थे, बाँट नहीं सकते थे। उस समय जेल की हवा तक भारी हो गई थी। सन्नाटा भी जैसे कराहता था। ऐसा लगता था मानो ईंटें, फर्श, सलाखें—सब कुछ उस निर्दयता के साक्षी बनकर भीतर-ही-भीतर काँप उठे हों।
कुछ सहबंदियों को सचमुच लगा कि अब अश्विनी चौबे के प्राण-पखेरू उड़ गए होंगे। कुछ ने सोचा, शायद अब वे कभी नहीं लौटेंगे। कोई किसी से खुलकर पूछ नहीं सकता था, कोई रो नहीं सकता था, कोई दौड़कर देख नहीं सकता था। पर सबके भीतर एक ही प्रश्न किसी अदृश्य शूल की तरह धँस गया था—कौन लौटेगा, कौन नहीं? यह प्रश्न केवल अश्विनी चौबे के लिए नहीं था; वह हर बंदी के भाग्य पर लटका हुआ प्रश्न बन गया। आज वह गया, कल कौन जाएगा? आज उसकी बारी थी, कल किसकी होगी? कौन फिर अपने परिवार के बीच पहुँचेगा, और कौन इसी अंधकार में कहीं खो जाएगा—इस अनिश्चितता ने पूरे कारागार को मृत्यु-सी आशंका से भर दिया।
उस भय की छाया जेल की कोठरियों तक सीमित नहीं रही। बाहर परिवारों में भी वही अंधकार उतर आया। जिन घरों के चूल्हे कभी विश्वास की लौ से जलते थे, वहाँ अब चिंता का धुआँ भरा रहता था। माँ की आँखें दरवाजे पर टिकी रहतीं, पत्नी का मन हर आहट पर सिहर उठता, भाई-बहन किसी समाचार की प्रतीक्षा में सूखते जाते। कोई निश्चित सूचना नहीं, कोई भरोसेमंद संदेश नहीं—सिर्फ आशंका। और जब अश्विनी चौबे पर हुई इस भीषण प्रताड़ना का समाचार धीरे-धीरे बाहर पहुँचा, तो निराशा का एक मौन ज्वार साथियों और परिवारों के भीतर फैल गया। हर किसी ने मन-ही-मन यही सोचा—आज यदि उनके साथ ऐसा हुआ है, तो कल हमारे अपने के साथ क्या होगा? इस प्रकार आपातकाल ने केवल मनुष्यों को जेल में नहीं डाला; उसने परिवारों को भी भय के एक अदृश्य कारागार में बंद कर दिया।
इस कथा का एक और अत्यंत मार्मिक पक्ष है। जब लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने अश्विनी कुमार चौबे पर हुई इस लोमहर्षक यातना का समाचार सुना, तो वे गहरे व्यथित हुए। कहा जाता है कि बाद में वे अश्विनी चौबे को देखने स्वयं पहुँचे। यह मात्र एक कुशल-क्षेम पूछने की घटना नहीं थी; यह उस नैतिक संबंध की पराकाष्ठा थी, जो आंदोलन के नेतृत्व और उसके युवा वाहकों के बीच निर्मित हुआ था। जिस युवक ने कभी उन्हें पटना विश्वविद्यालय के छात्र-शपथ समारोह में आने के लिए प्रेरित किया था, उसी युवक को इस दशा में देखना लोकनायक के लिए केवल निजी वेदना नहीं, बल्कि उस पूरे संघर्ष की पीड़ा का मूर्त अनुभव रहा होगा। उस क्षण में एक युग दूसरे युग के घाव को देख रहा था; एक नेतृत्व अपने घायल युवक की देह पर पड़े प्रहारों में पूरे लोकतंत्र की चोट को पढ़ रहा था।
और फिर भी—यही इस कथा का सबसे महान, सबसे उज्ज्वल और सबसे स्तब्ध कर देने वाला पक्ष है—इतनी यातना, इतना भय, इतनी अनिश्चितता और इतनी अमानुषिकता के बीच भी अश्विनी चौबे और उनके जैसे असंख्य लोकतंत्र सेनानियों ने प्रतिहिंसा का मार्ग नहीं अपनाया। उन्होंने घृणा को अपना धर्म नहीं बनाया। उन्होंने हिंसा को अपनी भाषा नहीं बनने दिया। उनकी देह टूटी, पर उनका विश्वास नहीं टूटा। उनके स्वर दबाए गए, पर उनका संकल्प मौन नहीं हुआ। वे जानते थे कि वे केवल अपने लिए नहीं सह रहे; वे उस भविष्य के लिए सह रहे हैं, जिसमें भारत फिर से खुलकर साँस ले सके।
इसलिए अश्विनी चौबे की यह कथा केवल एक व्यक्ति की यातना की कथा नहीं है। यह उस युग की अंतरात्मा की कथा है। यह बताती है कि लोकतंत्र चुनावों से नहीं, भाषणों से नहीं, और केवल संवैधानिक प्रावधानों से भी नहीं बचता; वह बचता है उन मनुष्यों की सहनशीलता, नैतिकता और आस्था से, जो असहनीय पीड़ा के बीच भी सत्य का साथ नहीं छोड़ते। “कौन लौटेगा, कौन नहीं”—यह प्रश्न उस समय जेल की दीवारों में कैद था, पर उसका उत्तर इतिहास ने बाद में दिया। बहुत-से लोग लौटे, बहुत-से नहीं लौटे; पर जो नहीं भी लौटे, उनकी वेदना इस राष्ट्र की लोकतांत्रिक चेतना में अमिट होकर रह गई।
आज जब हम उस अंधकार को स्मरण करते हैं, तो अश्विनी चौबे की पीड़ा की यह कथा हमें झकझोरकर याद दिलाती है कि लोकतंत्र कोई उपहार नहीं है; यह सहन की गई असंख्य वेदनाओं का अर्जित प्रकाश है। और उस प्रकाश की लौ में आज भी वे सभी चेहरे दीखते हैं, जिन्होंने कारागार के अंधेरे में भी आशा को बुझने नहीं दिया।
रिपोर्टर
पूजा तिवारी







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