लोकतंत्र विजय महोत्सव में उठी मांग — नई पीढ़ी को आपातकाल का सत्य पढ़ाया जाए, लोकतंत्र सेनानियों को मिले समुचित राष्ट्रीय सम्मान

लोकतंत्र विजय महोत्सव में उठी मांग — नई पीढ़ी को आपातकाल का सत्य पढ़ाया जाए, लोकतंत्र सेनानियों को मिले समुचित राष्ट्रीय सम्मान
नई दिल्ली, 21 मार्च 2026।
नई दिल्ली में आयोजित लोकतंत्र विजय महोत्सव में देशभर से आए लोकतंत्र सेनानियों, मीसाबंदियों, डी.आई.आर. बंदियों तथा लोकतंत्र-चेतना से जुड़े नागरिकों ने एक स्वर से कहा कि आपातकाल भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का एक ऐसा काला अध्याय है, जिसकी सही, तथ्यपूर्ण और संपूर्ण जानकारी नई पीढ़ी तक पहुँचना अत्यंत आवश्यक है। समारोह में यह भी प्रबल स्वर से कहा गया कि लोकतंत्र की रक्षा के लिए जेलें भरने वाले, यातनाएँ सहने वाले और नागरिक स्वतंत्रताओं की पुनर्स्थापना के लिए संघर्ष करने वाले लोकतंत्र सेनानियों को देश के विभिन्न राज्यों की भाँति सम्मान, मान्यता, सुविधाएँ और सार्वजनिक प्रतिष्ठा प्रदान की जानी चाहिए।
इस अवसर पर प्रमुख रूप से संघ विचारक श्री इंद्रेश कुमार, पूर्व केंद्रीय मंत्री श्री अश्विनी कुमार चौबे, पूर्व सांसद एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री कैलाश सोनी, तथा पूर्व विधायक श्री दुर्गा प्रसाद सिंह ने अपने विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम में श्री ओ.पी. बब्बर, श्री मेघराज जी, श्री मदन भाटन, श्री रामकृष्ण कुशमरिया, विभिन्न प्रांतों के पदाधिकारी तथा देशभर से आए लोकतंत्र सेनानी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।
श्री इंद्रेश कुमार ने अपने उद्बोधन में कहा कि भारत के स्वतंत्रता संघर्ष के अनेक आंदोलन अहिंसक संकल्प के साथ आरंभ अवश्य हुए, पर अनेक बार वे हिंसा की ओर मुड़ गए और परिणामतः उन्हें स्थगित अथवा समाप्त करना पड़ा। उन्होंने प्रश्न उठाया कि स्वतंत्रता के जिस आंदोलन की परिणति में 10 से 15 लाख लोगों का जीवन नष्ट हुआ हो, व्यापक रक्तपात हुआ हो और देश को विभाजन जैसी महात्रासदी झेलनी पड़ी हो, उसे पूर्णतः अहिंसक आंदोलन कैसे कहा जा सकता है? उन्होंने कहा कि इतिहास का मूल्यांकन केवल नारे या भावनात्मक स्मृतियों से नहीं, बल्कि उसके परिणामों से भी किया जाना चाहिए। इसके विपरीत लोकतंत्र सेनानियों का आंदोलन पूर्णत: संयमित, अनुशासित और एकपक्षीय अहिंसा का आंदोलन था। लोकतंत्र सेनानियों ने क्रूर शासन की लोमहर्षक यातनाएँ सहीं, पर हिंसक प्रतिकार का मार्ग नहीं अपनाया। यही कारण है कि यह आंदोलन भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास में नैतिक ऊँचाई, धैर्य और लोकतंत्र-निष्ठा का अद्वितीय उदाहरण बनकर खड़ा है।
समारोह का सर्वाधिक विस्तृत और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य प्रस्तुत करते हुए श्री अश्विनी कुमार चौबे ने जेपी आंदोलन की पृष्ठभूमि से लेकर आपातकाल की लोमहर्षक घटनाओं तक का अत्यंत मार्मिक और विस्तारपूर्ण वर्णन किया। उन्होंने कहा कि वह केवल एक राजनीतिक आंदोलन नहीं था, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की आत्मा, नागरिक स्वतंत्रता और संवैधानिक मर्यादा को बचाने का राष्ट्रीय अभियान था। श्री चौबे ने स्मरण किया कि वे स्वयं स्वर्गीय सुशील मोदी के साथ जाकर लोकनायक जयप्रकाश नारायण से छात्र आंदोलन का नेतृत्व स्वीकार करने का आग्रह करने पहुँचे थे। उन्होंने कहा कि उस समय देश का युवा वर्ग भ्रष्टाचार, कुशासन, सत्ता-अहंकार और तानाशाही प्रवृत्तियों के विरुद्ध एक नैतिक नेतृत्व की खोज में था, और लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने उस ऐतिहासिक पुकार को स्वीकार कर उसे राष्ट्रव्यापी जन-जागरण में परिवर्तित किया।
श्री अश्विनी कुमार चौबे ने कहा कि जेपी आंदोलन ने केवल राजनीतिक परिवर्तन का आह्वान नहीं किया, बल्कि समाज के भीतर नैतिक जागरण, युवा चेतना और जन-भागीदारी की एक नई धारा प्रवाहित की। उन्होंने कहा कि छात्र-युवा शक्ति जब लोकनायक के नेतृत्व में संगठित हुई, तब देश ने पहली बार इतनी व्यापकता से यह अनुभव किया कि लोकतंत्र केवल चुनाव की व्यवस्था नहीं, बल्कि जनता की आत्मा का नाम है। उन्होंने कहा कि आपातकाल इसी जागरण को कुचलने का प्रयास था।
श्री चौबे ने आगे कहा कि आपातकाल केवल राजनीतिक दमन नहीं था; वह लोकतंत्र, संविधान, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, संगठन की स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों पर किया गया योजनाबद्ध कुठाराघात था। उन्होंने बड़े वेदनापूर्ण शब्दों में उन लोमहर्षक यातनाओं का उल्लेख किया, जिन्हें उन्होंने स्वयं और लाखों लोकतंत्र सेनानियों ने सहा। उन्होंने कहा कि जेलें भरी गईं, आवाजें दबाई गईं, असहमति को अपराध बना दिया गया, और सत्ता की रक्षा के लिए शासन-तंत्र को दमन के औजार में परिवर्तित कर दिया गया। अनेक परिवार बिखर गए, असंख्य युवाओं का भविष्य अवरुद्ध हुआ, और लोकतांत्रिक प्रतिरोध को कुचलने के लिए भय का वातावरण निर्मित किया गया।
उन्होंने स्पष्ट कहा कि यह सब केवल शासन चलाने के लिए नहीं, बल्कि परिवार की राजनीति को बनाए रखने, वंशवाद की राजनीति को बचाए रखने और सत्ता को एक परिवार-केंद्रित ढाँचे में सुरक्षित रखने के लिए लोकतंत्र पर किया गया निर्मम प्रहार था। उन्होंने कहा कि जिस शासन को जनता की आवाज से डर लगता है, वह सबसे पहले अभिव्यक्ति, संगठन और प्रतिरोध की स्वतंत्रता पर हमला करता है। आपातकाल उसी मानसिकता की परिणति था। श्री चौबे ने कहा कि नई पीढ़ी को यह जानना ही होगा कि लोकतंत्र स्वतः सुरक्षित नहीं रहता; उसे असंख्य त्यागों, जेल-यात्राओं, संघर्षों और बलिदानों से बचाया जाता है।
इसी संदर्भ में श्री चौबे ने मांग की कि केंद्र और राज्य शिक्षा बोर्डों के पाठ्यक्रम में आपातकाल पर एक पृथक अध्याय समाहित किया जाए, ताकि विद्यार्थी लोकतंत्र के मूल्य, उसके संकट, सत्ता के दुरुपयोग के दुष्परिणाम और उसकी रक्षा के लिए हुए संघर्ष को समझ सकें। उन्होंने कहा कि यदि नई पीढ़ी को आपातकाल का सत्य नहीं बताया गया, तो लोकतंत्र की रक्षा का ऐतिहासिक बोध अधूरा रह जाएगा। उन्होंने इस बात पर भी बल दिया कि देश के 14–15 राज्यों में लोकतंत्र सेनानियों को जो सम्मान, सुविधाएँ और मान्यता दी जा रही है, उसी प्रकार दिल्ली के लोकतंत्र सेनानियों को भी समुचित सम्मान मिलना चाहिए।
श्री कैलाश सोनी ने कहा कि एक व्यक्ति की सत्ता-पिपासा ने देश पर अवैध रूप से आपातकाल थोपा और लोकतांत्रिक संस्थाओं को दबाने का प्रयास किया। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र सेनानियों का सम्मान वास्तव में लोकतंत्र की प्रतिष्ठा का सम्मान है।
पूर्व विधायक श्री दुर्गा प्रसाद सिंह ने कहा कि युवा पीढ़ी को लोकतंत्र-रक्षा के इस इतिहास से जोड़ना समय की आवश्यकता है, और “यूथ फॉर डेमोक्रेसी” जैसे प्रयास इसी दिशा में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
समारोह में यह भी उल्लेख किया गया कि भारत के लगभग सभी प्रांतों से लगभग 500 लोकतंत्र सेनानी, मीसाबंदी और डी.आई.आर. बंदी इस महोत्सव में सहभागी बने। इनमें अधिकांश प्रतिभागी 70 वर्ष से अधिक आयु के हैं, फिर भी उन्होंने लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति अपनी अटूट निष्ठा, जीवट और समर्पण का परिचय देते हुए कार्यक्रम में भाग लेने की सहमति दी और नई दिल्ली पहुँचे। जो स्वयं उपस्थित नहीं हो सके, उन्होंने अपनी एकजुटता और समर्थन व्यक्त करने के लिए अपनी संतानों और अगली पीढ़ी के प्रतिनिधियों को “लोक-प्रहरी” के रूप में भेजा। यह दृश्य इस बात का सशक्त प्रतीक बना कि लोकतंत्र रक्षा की वह ज्योति अब पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ रही है।
समारोह के समापन पर श्री इंद्रेश कुमार ने विशेष रूप से श्री राजन ढींगरा के संयोजन, संगठनात्मक सक्रियता और पूरे देश से लोकतंत्र सेनानियों को आमंत्रित कर इस विराट उपस्थिति को संभव बनाने के लिए धन्यवाद ज्ञापित किया। उन्होंने कहा कि यह आयोजन केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि राष्ट्र की लोकतांत्रिक स्मृति, संघर्षशील चेतना और कृतज्ञता का जीवंत रूप है।
जारीकर्ता:
लोकतंत्र सेनानी संघ (दिल्ली प्रदेश)
(1975 आपातकाल बंदियों का अखिल भारतीय संगठन)
शीतला प्रसाद तिवारी

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