संस्थापक संरक्षक श्री राम कर्म भूमि न्यास
श्री अश्विनी कुमार चौबे, पूर्व केंद्रीय मंत्री, भारत के उन दुर्लभ लोक नेताओं में हैं, जिनकी राजनीति जनादेश से नहीं, जन श्रद्धा से संचालित होती है। उनके लिए सत्ता कोई सिंहासन नहीं, अपितु सनातन धर्म की सेवा का यज्ञकुंड है — जिसमें वे नीतियों की समिधा डालकर लोक कल्याण की ज्वाला को प्रज्वलित करते हैं।
स्वास्थ्य, पर्यावरण और आयुष जैसे मंत्रालयों का नेतृत्व करते हुए उन्होंने केवल योजनाएं नहीं बनाई, संस्कृति के मूल में बैठे जीवन-मूल्यों को प्रशासनिक परिपाटियों से जोड़ा। गंगा को केवल नदी नहीं, मां माना, और उसके तटों पर आरती के दीप जलवाए, जन चेतना के प्रदीप के रूप में।
बिहार के बक्सर में उनके मार्गदर्शन में आयोजित संत समागम समारोह और अंतरराष्ट्रीय संत सम्मेलन केवल आयोजनों की शृंखला नहीं थे — वे धर्म की संवेदना के तीर्थ थे, जहाँ देश-विदेश के संतों ने वैदिक नाद और रामकथा की अनुपम छाया में विचार-विनिमय किया। इन आयोजनों के माध्यम से चौबे जी ने स्पष्ट किया कि भारत की उन्नति परंपरा और प्रज्ञा के संयोग से ही संभव है।
6 जुलाई 2025 को सम्पन्न ‘सनातन महोत्सव’, जिसमें भगवान परशुराम की प्रतिष्ठा हुई, एक ऐतिहासिक सांस्कृतिक पुनर्स्थापना थी। इस आयोजन में चौबे जी केवल आयोजक नहीं थे — वे एक धर्म-दीप की तरह थे, जिन्होंने परशुराम जी के शौर्य, ब्रह्म तेज और सनातन गौरव को जनमानस में पुनः प्रतिष्ठित किया। उस दिन राजनीति की सीमाएं लांघकर उन्होंने धर्म की ध्वजा को युग-बोध के गगन में पुनः लहराया।वे मानते हैं कि भारत की आत्मा गांव, गोचर, गीता और गौशाला में निवास करती है। उनके विचारों में भक्ति का स्पर्श है और उनके कार्यों में कर्मयोग का स्पंदन। वे जन-सेवक हैं, परंतु उससे कहीं अधिक- सनातन के संरक्षक, संस्कृति के सेतु और संतों की वाणी के संवाहक हैं।









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