सनातन भक्ति की ध्वनि और चेतना के जीवंत तीर्थ
जब कोई संत अपने तप, त्याग और तत्वज्ञान से केवल एक आश्रम नहीं, अपितु एक युगसंस्कार का केंद्र खड़ा करता है — तो वह केवल महंत नहीं, युगद्रष्टा होता है। वृंदावन के श्री रास बिहारी आश्रम के अधिष्ठाता, जगद्गुरु स्वामी अनंताचार्य जी महाराज ऐसे ही एक संतपुरुष हैं, जिनकी वाणी में वेदों की गरिमा है और उनके जीवन में श्रीकृष्ण की माधुरी बसती है।
श्री अनंताचार्य जी महाराज ने भारतीय जीवनमूल्यों को केवल मंचों पर नहीं, व्यवस्था और व्यवहार में उतारकर दिखाया। उनका आश्रम न केवल पूजापाठ का स्थल है, बल्कि गुरुकुल, ग्रंथालय, छात्रावास तथा पर्यावरण अनुकूल संरचनाओं से युक्त एक धार्मिक विश्वविद्यालय के समतुल्य है। वे मानते हैं कि भक्ति तभी सार्थक है जब वह सेवा, शिक्षा और संवेदना के रूप में समाज में प्रकट हो।
उनकी वाणी में वेदों की गंभीरता, गीता की गूढ़ता और श्रीमद्भागवत की करुणा समाहित है। प्रवचन करते समय वे श्रोताओं को केवल ज्ञान नहीं देते, उन्हें अनुभव कराते हैं कि सनातन धर्म कोई मत नहीं, आत्मा की गति है। वे कहते हैं— “ईश्वर केवल प्रेम के भूखे हैं”, और इसी प्रेम को वे संसार में बाँटते चलते हैं — चाहे वह मंच पर हो, चाहे वनवासी ग्रामों में।
स्वामी अनंताचार्य जी महाराज केवल भारत तक सीमित नहीं हैं। उन्होंने अनेक देशों में सनातन धर्म का प्रचार किया — अमेरिका, यूके, ऑस्ट्रेलिया, और मध्य यूरोप तक श्रीकृष्ण की लीलाओं और श्रीराम के आदर्शों की कथा को जनमानस तक पहुँचाया। वे संस्कृति के दूत हैं, परंपरा के दर्पण हैं और सेवा के साक्षात स्वरूप।
पर्यावरण के प्रति उनकी आस्था भी अलौकिक है। हाल ही में पटना में आयोजित ‘सनातन महाकुंभ‘ में उनका स्वागत फूलों से नहीं, वृक्षारोपण योग्य पौधे से किया गया, क्योंकि वे मानते हैं कि धरती भी एक देवता है, जिसकी सेवा पूजा से भी श्रेष्ठ है। वे संत हैं, किंतु जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में परमात्मा की उपस्थिति को साक्षात कर दिखाने वाले योगी हैं।
उनका संदेश स्पष्ट है, धर्म का अर्थ केवल पूजा नहीं, प्रकृति से प्रेम, मानव से करुणा, और संस्कृति से समर्पण है। वे वृंदावन की कुंजगली से लेकर वैश्विक मंचों तक, श्रीराधामाधव की भक्ति और वेदवाणी की पताका लहरा रहे हैं।
स्वामी अनंताचार्य जी महाराज का जीवन संन्यास की परंपरा में कर्म की लौ है जो केवल बोलती नहीं, जीती है। वे सनातन धर्म की उस जीवंत धारा के वाहक हैं, जो वाणी, विचार और व्यवहार — तीनों में राम और राधा को बसाए चलती है।
स्वामी अनंताचार्य जी महाराज — सनातन भक्ति की ध्वनि और चेतना के जीवंत तीर्थ
जब कोई संत अपने तप, त्याग और तत्वज्ञान से केवल एक आश्रम नहीं, अपितु एक युग-संस्कार का केंद्र खड़ा करता है — तो वह केवल महंत नहीं, युगद्रष्टा होता है। वृंदावन के श्री राधा-माधव दिव्य देश आश्रम के अधिष्ठाता, जगद्गुरु स्वामी अनंताचार्य जी महाराज ऐसे ही एक संत-पुरुष हैं, जिनकी वाणी में वेदों की गरिमा है और उनके जीवन में श्रीकृष्ण की माधुरी बसती है।
श्री अनंताचार्य जी महाराज ने भारतीय जीवन-मूल्यों को केवल मंचों पर नहीं, व्यवस्था और व्यवहार में उतारकर दिखाया। उनका आश्रम न केवल पूजा-पाठ का स्थल है, बल्कि गुरुकुल, ग्रंथालय, छात्रावास तथा पर्यावरण अनुकूल संरचनाओं से युक्त एक धार्मिक विश्वविद्यालय के समतुल्य है। वे मानते हैं कि भक्ति तभी सार्थक है जब वह सेवा, शिक्षा और संवेदना के रूप में समाज में प्रकट हो।
उनकी वाणी में वेदों की गंभीरता, गीता की गूढ़ता और श्रीमद्भागवत की करुणा समाहित है। प्रवचन करते समय वे श्रोताओं को केवल ज्ञान नहीं देते, उन्हें अनुभव कराते हैं कि सनातन धर्म कोई मत नहीं, आत्मा की गति है। वे कहते हैं— “ईश्वर केवल प्रेम के भूखे हैं”, और इसी प्रेम को वे संसार में बाँटते चलते हैं — चाहे वह मंच पर हो, चाहे वनवासी ग्रामों में।
स्वामी अनंताचार्य जी महाराज केवल भारत तक सीमित नहीं हैं। उन्होंने अनेक देशों में सनातन धर्म का प्रचार किया — अमेरिका, यूके, ऑस्ट्रेलिया, और मध्य यूरोप तक श्रीकृष्ण की लीलाओं और श्रीराम के आदर्शों की कथा को जनमानस तक पहुँचाया। वे संस्कृति के दूत हैं, परंपरा के दर्पण हैं और सेवा के साक्षात स्वरूप।
पर्यावरण के प्रति उनकी आस्था भी अलौकिक है। हाल ही में पटना में आयोजित ‘सनातन महाकुंभ‘ में उनका स्वागत फूलों से नहीं, वृक्षारोपण योग्य पौधे से किया गया — क्योंकि वे मानते हैं कि धरती भी एक देवता है, जिसकी सेवा पूजा से भी श्रेष्ठ है। वे संत हैं, किंतु जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में परमात्मा की उपस्थिति को साक्षात कर दिखाने वाले योगी हैं।
उनका संदेश स्पष्ट है — धर्म का अर्थ केवल पूजा नहीं, प्रकृति से प्रेम, मानव से करुणा, और संस्कृति से समर्पण है। वे वृंदावन की कुंजगली से लेकर वैश्विक मंचों तक, श्रीराधा-माधव की भक्ति और वेद-वाणी की पताका लहरा रहे हैं।
स्वामी अनंताचार्य जी महाराज का जीवन संन्यास की परंपरा में कर्म की लौ है — जो केवल बोलती नहीं, जीती है। वे सनातन धर्म की उस जीवंत धारा के वाहक हैं, जो वाणी, विचार और व्यवहार — तीनों में राम और राधा को बसाए चलती है।









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