गंगा के तट पर बसा दिव्य तीर्थ
ओझा
काशी विश्वनाथ मंदिर केवल पत्थर और सोने का बना भवन नहीं है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति और आध्यात्म का जीवंत प्रतीक है। यहाँ आकर हर व्यक्ति को अपनी जड़ों से जुड़ाव महसूस होता है। इसीलिए कहा जाता है—“काशी के कण-कण में शिव का वास है।”
जो भी भक्त सच्चे मन से यहाँ आता है, वह खाली हाथ नहीं लौटता। बाबा विश्वनाथ की कृपा सभी पर बनी रहे और हम सभी को उनके चरणों में स्थान मिले।
हर हर महादेव! बम बम भोले!
काशी विश्वनाथ मंदिर—वाराणसी जहाँ समय ठहर-सा जाता है और शिव की करुणा गंगाजल बनकर झरती है। काशी की तंग गलियों में चलते हुए जब घंटियों की ध्वनि, शंखनाद और “हर-हर महादेव” का गूँजता स्वर कानों में पड़ता है, तो मन अपनी थकान भूलकर अपने आप विश्वनाथ की देहरी पर प्रणाम करने लग जाता है। यह केवल एक मंदिर नहीं, शिव की उस अनादि उपस्थिति का प्रत्यक्ष केंद्र है जहाँ भक्त और भगवान के बीच कोई दूरी शेष नहीं रहती।
“वागर्थाविव सम्पृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये।
जगतः पितरौ वन्दे पार्वती-परमेश्वरौ॥” — कालिदास
इस सरल, मंगलाचरणी श्लोक में कालिदास वाणी और अर्थ की अविच्छिन्न जोड़ी की तरह पार्वती-परमेश्वर को प्रणाम करते हैं। काशी में आते ही यही अनुभूति होती है—देह और देहिता, साधक और साध्य, भाषा और भाव—सब कुछ एक हो जाता है। विश्वनाथ—अर्थात ‘विश्व के नाथ’—का यह ज्योतिर्लिंग बारह महा ज्योतिर्लिंगों में प्रमुख है। ऐसी मान्यता है कि काशी महादेव की प्रिय नगरी है, जहाँ वे प्रत्येक श्वास में, प्रत्येक धड़कन में, प्रत्येक दीप-ज्योति में विराजते हैं।
मंदिर का शिखर देखते ही मन गंगाजल-सा निर्मल हो उठता है। बाहर गली में बेलपत्र, धतूरा, रुद्राक्ष और गंगाजल की छोटी-छोटी शीशियाँ बिकती दिखती हैं—जैसे भक्ति यहाँ वस्तु नहीं, जीवन का सहज व्यापार हो। भीतर गर्भगृह में विश्वनाथ की काले पत्थर की शिवलिंग पर दुग्धाभिषेक की धारा बहती है, और पुजारी के मंत्रोच्चार से मन का आकाश स्वच्छ हो जाता है। “ॐ नमः शिवाय” का पंचाक्षरी मंत्र ज्यों-ज्यों जपा जाता है, भीतर की विक्षिप्तता पिघलती जाती है।
विश्वनाथ धाम कॉरिडोर — परंपरा और सुविधा का सेतु
13 दिसंबर 2021 को लोकार्पित श्री काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर ने दर्शन-अनुभव को नई गरिमा दी है। लगभग 5.5 एकड़ (करीब 5 लाख वर्गफुट) में फैला यह परिसर मंदिर को सीधे गंगा तट से जोड़ता है—जिससे श्रद्धालु चौड़े, सुव्यवस्थित मार्ग से घाटों तक सहज पहुँचते हैं। परियोजना के प्रथम चरण में 23 नई इमारतें—जैसे यात्री-सुविधा केंद्र, टूरिस्ट फैसिलिटेशन सेंटर, वैदिक केंद्र, मुमुक्षु भवन, भोगशाला, सिटी म्यूज़ियम, व्यूइंग गैलरी, फूड कोर्ट—समर्पित की गईं, और 40 से अधिक प्राचीन मंदिरों का संरक्षण-पुनरुद्धार हुआ। यह कॉरिडोर केवल निर्माण नहीं, भक्त और गंगा, परंपरा और आधुनिक सुविधा के बीच एक सजीव पुल है। (Press Information Bureau, Kashi, India Today)
“नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय
भस्माङ्गरागाय महेश्वराय।” – आदि शंकराचार्य
यह छोटा-सा, सहज श्लोक शिव की वही छवि सामने लाता है—नाग को हार बनाकर, भस्म से विभूषित, तीसरे नेत्र से अज्ञान का अंधकार दूर करते महादेव। काशी में यही भाव हर ओर फैला है। गंगा की धारा जैसे शिव-जटा से निकली अलकनंदा हो; धूप-दीप की सुगंध जैसे मंदिर प्रांगण में टहलती शिव-स्मृति हो; और भक्तों का सागर जैसे स्वयं नंदी की मौन स्तुति।
कहा जाता है कि काशी केवल देखने की नहीं, कंठस्थ करने की जगह है; यहाँ की हवा, यहाँ का जल, यहाँ का शब्द—सब कुछ स्मृति बनकर हृदय में बस जाता है। सुबह-सुबह मंगला आरती में भाग लें तो गंगा की ओर से आती ठंडी हवा में कहीं शहद-सी मिठास घुली होती है। संध्या-आरती के समय दीपों की लौ जब तरंगों पर नाचती है, तब लगता है जैसे असंख्य जिह्वाएँ “हर-हर महादेव” गाती हुई आकाश तक उठ रही हों और आरती के पश्चात “गंगा द्वार” पर खड़े होकर झिलमिलाते दीपों को देखते-देखते मन समझता है—कॉरिडोर ने काशी की दिव्यता को और करीब ला दिया है; दर्शन अब दृश्य भी है और अनुभूति भी।
कबीर, जो इसी काशी की धूल में पले-बढ़े, एक अलौकिक संकेत देते हैं—
“मोको कहाँ ढूँढे रे बन्दे, मैं तो तेरे पास में।
यह पंक्तियाँ विश्वनाथ की देहरी पर और अर्थवान लगती हैं: शिव बाहर जितने हैं, भीतर उतने ही। मंदिर हमें बाहरी दर्शन से भीतर के दर्शन तक ले जाता है। इसीलिए काशी-यात्रा केवल तीर्थाटन नहीं, आत्म-यात्रा बन जाती है, जहाँ बाहरी आराधना अंततः अंतर्यामी से मिलवा देती है।
श्रावण मास के सोमवार हों या महाशिवरात्रि का रात्रि-जागरण
बाबा विश्वनाथ के द्वार पर भक्ति का सागर उमड़ पड़ता है। डमरू की ताल और शंख की प्रतिध्वनि से वातावरण तरंगित हो उठता है। कहीं दुग्धाभिषेक, कहीं जलाभिषेक, कहीं बिल्वपत्र-अर्पण हर विधि एक ही बात कहती है: “हे विश्वनाथ! हमें भी अपने समान सरल, निर्व्याज और व्यापक बना लो।” दर्शन की कतार में खड़े-खड़े जब किसी वृद्धा को गोद में बच्चे को लिए ‘बोल बम’ कहते देखते हैं, तब लगता है, भक्ति उम्र नहीं, आत्मा की भाषा है।
काशी की गलियाँ भी मानो चलती-फिरती काव्य-पंक्तियाँ हैं। कहीं भव्य महलों की खिड़कियों से उतरती धूप, तो कहीं मंदिरों की श्रृंखलाएँ—जिनमें लोहे की नहीं, भावनाओं की कड़ियाँ लगी हैं। विश्वनाथ गलियाँ केवल बाज़ार नहीं, ये स्मृतियों का कोलाज हैं, जहाँ मिठाई की दुकानों की महक में काव्य, रेशमी दुपट्टों की सरसराहट में आराधना और रुद्राक्ष-रोली-भस्म में सौम्य विराग मिलता है।
यहाँ की दार्शनिकता सरल है। शिव का अर्थ शून्य नहीं, समूचा ब्रह्मांड है; विरक्ति का अर्थ पलायन नहीं, विस्तार है। भक्त समझता है कि विश्वनाथ के सम्मुख खड़े होकर वह केवल ‘मैं’ नहीं रहता—वह ‘हम’ बन जाता है, और फिर ‘सब’ में विलीन हो जाता है। यही कारण है कि काशी में हर यात्री सहयात्री बन जाता है: एक के हाथ में आरती का थाल, दूसरे के हाथ में जल का कलश, तीसरे के होंठों पर मंत्र—पर सबके हृदय में एक ही विश्वनाथ।
हमारे संत जन एवं वयोव्र्द्ध कहते हैं—काशी में मृत्यु तक मोक्ष का द्वार है; पर उससे बड़ा सत्य यह है कि यहाँ जीवन भी मोक्ष-सा निर्मल हो जाता है। जब गंगा की लहरें घाटों से टकराकर लौटती हैं, तो वे केवल जल नहीं लौटातीं—वे उस निश्चय को लौटाती हैं कि हम अपने भीतर के तम को हर दिन थोड़ा-थोड़ा जीतेंगे। विश्वनाथ का दर्शन यही संकल्प जगाता है—कर्म में पवित्रता, वाणी में सत्य, मन में करुणा और जीवन में प्रसाद।
और अंत में, जब आप मंदिर से बाहर निकलते हैं, धूप की एक किरण माथे के चंदन को छू जाती है तो अनुभूति होती है जैसे स्वयं शिव ने करुणा से स्पर्श किया हो। तब समझ आता है कि काशी क्यों अनादि-नगरी कही जाती है। यहाँ समय नहीं बीतता, समय परिपक्व होता है; यहाँ यात्रा समाप्त नहीं होती, यात्रा परंपरा बनती है; यहाँ भक्ति केवल भाव नहीं, जीवन-रीति है।विश्वनाथ के चरणों में यही नम्र प्रार्थना—हे नाथ! हमारी वाणी को करुणा दें, हमारी दृष्टि को व्यापकता दें, और हमारा हृदय ऐसा मंदिर बना दें जहाँ हर प्राणी आपका ही प्रतिबिम्ब लगे।
हर-हर महादेव! हर-हर महादेव!








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