अश्विनी कुमार चौबे: राष्ट्रधर्म के दीपस्तंभ और सनातन के यशस्वी ध्वज वाहक

जिस धरा ने महर्षि विश्वामित्र और महाकवि वाल्मीकि को जन्म दिया, उसी तपोभूमि बिहार की गोद में जन्मे श्री अश्विनी कुमार चौबे (जन्म: 2 जनवरी 1953) भारतीय राजनीति के उन दीपों में हैं, जो न केवल शासन की राह को आलोकित करते हैं, अपितु सनातन संस्कृति की अमर ज्वाला को भी जन-जन तक प्रज्वलित करते हैं। भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता, बक्सर से लोकसभा के दो कार्यकाल तक प्रतिनिधि तथा केंद्रीय मंत्रिमंडल में स्वास्थ्य, उपभोक्ता, खाद्य वितरण, पर्यावरण और जलवायु जैसे विविध मंत्रालयों में राज्यमंत्री रहकर इन्होंने राष्ट्रसेवा की धारा को साधुता के सागर में प्रवाहित किया। बिहार विधानसभा में भागलपुर से पाँच बार विधायक रहकर, वे नीति और संस्कृति के संतुलन का श्रेष्ठ उदाहरण बने।

राजनीति के इस पथिक की यात्रा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से प्रारंभ हुई, जहाँ उन्होंने 1970 के दशक में छात्र आंदोलनों की अग्नि में अपने विचारों की आहुति दी। 1980 में भारतीय जनता पार्टी से जुड़कर वे राजनीति के उस हस्ताक्षर बने, जो जनसेवा और जनजागरण का पर्याय बन गया। जब तक प्रधान मंत्री श्री मोदी का ‘स्वच्छ भारत’ का नारा नहीं गूँजा था, चौबे जी बिहार के स्वास्थ्य मंत्री के रूप में 11,000 शौचालयों का निर्माण कर ग्रामीण भारत में स्वच्छता का संकल्प बुन चुके थे।

कोविड-19 की संकटकालीन बेला में आयुष्मान भारत योजना के क्रियान्वयन में उनका योगदान रक्षक और संरक्षक की भूमिका में निखरा।

श्रीराम कर्मभूमि न्यास के तत्वावधान में जब अहिरौली की पुण्यभूमि पर सनातन संस्कृति समागम 2022 का आयोजन हुआ, तब उसकी अग्निशिखा में आहुतियाँ केवल हवि की नहीं थीं, बल्कि वह श्रद्धा और संस्कृति की पुकार थी, जिसे अश्विनी कुमार चौबे जैसे यज्ञनायक ने दिशा दी।

जगद्गुरु पद्मविभूषण स्वामी रामभद्राचार्य, जगद्गुरु स्वामी अनंताचार्य ,श्री लक्ष्मीप्रपन्न जीयर स्वामी आदि  के सान्निध्य में आयोजित लक्ष्मीनारायण यज्ञ, अरणि-मंथन, मंत्रोच्चार और योगाभ्यास की दिव्यता ने अहिरौली को उत्तर भारत का सांस्कृतिक तीर्थ बना दिया। 2,500 से अधिक सुरक्षाकर्मियों की तैनाती, CCTV और व्यवस्थाओं की निगरानी यह दर्शाती है कि उनके नेतृत्व में श्रद्धा और व्यवस्था का अद्वितीय संगम हुआ।

6 जुलाई 2025, गांधी मैदान पटना- यह तिथि भारतीय सांस्कृतिक इतिहास में एक नवयुग के उद्घोष के रूप में अंकित हो गई। जब एक ओर पद्मविभूषण स्वामी रामभद्राचार्य की वाणी गूँज रही थी, वहीं दूसरी ओर पंडित धीरेन्द्र शास्त्री ( वागेश्वर धाम) की ओजस्वी वाणी में  हनुमान चालीसा और वैदिक मंत्रों के निनाद से आकाश भी सनातन के स्वरूप में पुलकित था।

108 गांवों से लाए गए शंख, अस्त्र-शस्त्र पूजन, और लाखों श्रद्धालुओं की उपस्थिति में सनातन संग भारत जनचेतना अभियान का शुभारंभ उस वैचारिक क्रांति की दस्तक थी, जिसमें संस्कृति केवल पूजा नहीं, राष्ट्र-चेतना का प्रतीक बनी।

अश्विनी कुमार चौबे ने केवल मंचों पर नहीं, विचारों और जन-संचार माध्यमों में भी सनातन के संदेश को मुखर किया। उनकी रथ यात्राएँ, जनजागरण अभियान और स्मारिकाएँ एक अनवरत संकल्प का प्रकटीकरण हैं। उनकी लेखनी और वक्तृत्व दोनों ही एक आध्यात्मिक जागरण के सूत्रधार बने हैं।

राजनीति में तप, संस्कृति में तेज और समाजसेवा में त्याग – इन त्रिवेणी धाराओं का संगम हैं अश्विनी कुमार चौबे। उनके नेतृत्व में संस्कृति कोई बीते युग की कथा नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों का पथप्रदर्शक बनी है। सनातन समागम और महाकुंभ जैसे आयोजनों ने यह सिद्ध किया है कि जब राजनीति में संतत्व और धर्म में यथार्थ समाहित हो, तो भारत पुनः विश्वगुरु के सिंहासन की ओर बढ़ता है।

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