श्रीकृष्ण जन्मोत्सव: सेवा और स्वावलंबन का दिव्य संदेश

योगेश्वर श्रीकृष्ण का अवतार केवल एक दिव्य चमत्कार मात्र नहीं, वरन् मानवता के कल्याण और धर्म की स्थापना का एक जीवंत महाकाव्य है। उनका जीवन केवल युद्धभूमि के सारथी तक सीमित नहीं है, वे गोकुल के ग्राम्य जीवन की आत्मा हैं। राजमहलों की विलासिता नहीं, बल्कि साधारण ग्वालों और ग्रामीणों के बीच उनकी लीलाएँ फली-फूलीं। उनका सम्पूर्ण अस्तित्व यही शिक्षा प्रदान करता है कि धर्म केवल पूजा-अर्चना तक सीमित न होकर सेवा और परोपकार के माध्यम से ही सार्थक होता है। श्रीकृष्ण ने मानव जीवन के हर पहलू —प्रेम, करुणा, न्याय, धर्म और सेवा -को छुआ है। उनका जन्मोत्सव केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि एक पावन अवसर है जब हम उनके द्वारा प्रदत्त शिक्षाओं को आत्मसात कर समाज और राष्ट्र के कल्याण के पथ पर अग्रसर हो सकते हैं।

इस सेवा-पर्व और समाजोत्थान के महायज्ञ का संचालन जिन संत के पावन मार्गदर्शन में हो रहा है, उनका सम्पूर्ण जीवन ही तप, त्याग और समर्पण की एक जीवंत गाथा है। परम पूज्य संत श्री ज्ञानेश्वर जी महाराज युवावस्था से ही राष्ट्र और समाज सेवा की भावना उनमें कूट-कूट कर भरी थी, जिसके कारण उन्होंने हिन्दू जागरण मंच, विश्व हिन्दू परिषद में अपनी सेवाएँ दीं और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) जैसे राष्ट्रीय संगठन में प्रदेश मंत्री के रूप में अपनी सेवाएँ प्रदान की।

उनकी कार्यकुशलता और नेतृत्व क्षमता से प्रभावित होकर उन्हें उत्तरप्रदेश के राज्यपाल के विशेष सहयोगी का दायित्व भी सौंपा गया। इसके अतिरिक्त, भाजपा के जिलाध्यक्ष के पद पर रहते हुए जनसेवा के नए कीर्तिमान स्थापित किए।

किन्तु सन 2015 में जीवन के एक नए मोड़ पर, वैराग्य की ज्योति प्रखर हुई और सांसारिक सम्मानों को ठुकराते हुए वे भगवान कृष्ण की नगरी वृन्दावन आ पहुँचे। यहाँ उन्होंने परम पूज्य सद्गुरुदेव नाभा पीठाधीश्वर जगद्गुरु श्री सुतीक्षण दास जी महाराज से दीक्षा लेकर आध्यात्मिक पथ पर अपने कदम रखे। गुरुदेव की दिव्य आज्ञा से उन्होंने कथा-प्रवचन के क्षेत्र में पदार्पण किया।

आज वे श्रीमद्भागवत कथा, श्रीरामकथा और शिवमहापुराण का मनोहारी गान करके सम्पूर्ण भारतवर्ष में धर्मजागरण का अलख जगा रहे हैं। साथ ही, वे विश्व हिन्दू परिषद में प्रांत धर्माचार संपर्क प्रमुख, धर्म रक्षा संघ के राष्ट्रीय संगठन मंत्री के रूप में समाज सेवा के अपने मिशन को निरंतर आगे बढ़ा रहे हैं। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि सच्चा आध्यात्मिक जीवन वही है जो समाज के उत्थान और जनकल्याण के लिए समर्पित हो।

गोकुल की पावन भूमि, जहाँ कृष्ण का बचपन बीता, वह केवल एक स्थान नहीं बल्कि प्रेम, सादगी और सेवा का प्रतीक है। कन्हैया ने मिट्टी से खेलते हुए, गायों की धूल में रचते-बसते हुए, वंशी की मधुर तान में सम्पूर्ण जगत को सम्मोहित किया। उनकी लीलाओं ने यह प्रमाणित किया कि ईश्वर की सर्वोच्चता गाँव और ग्राम्य जीवन में निहित है। उनका संदेश स्पष्ट है—प्रेम और भक्ति का सच्चा केंद्र गाँव और वहाँ के जन हैं। गोकुल की गलियों में आज भी कृष्ण की हँसी गूँजती है, गायों की रंभाहट और गोपियों की मुस्कान में उनकी उपस्थिति का आभास होता है।

श्रीमद्भागवत में वर्णित कृष्ण की लीलाएँ केवल बाल-क्रीड़ा नहीं हैं, वे सामाजिक शिक्षा का भी आधार हैं। जन्माष्टमी का पावन पर्व यदि केवल ढोल-नगाड़ों और भजन-कीर्तन तक सीमित रह जाए, तो यह अपूर्ण है। इस अवसर पर यदि संतों के हाथों से ग्रामीण महिलाओं को स्वावलंबन के साधन प्रदान किए जाएँ, सिलाई मशीन या अन्य साधन वितरित किए जाएँ तो यह केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि नारी-शक्ति के जागरण का सूत्रपात होगा। नारी घर की धुरी है, समाज की प्रेरणा है और राष्ट्र की आत्मा है। यदि वह आत्मनिर्भर बनेगी, तो परिवार और समाज दोनों सशक्त होंगे। यह समाज पर परोपकार होगा-

अर्थात्, परोपकार के समान कोई धर्म नहीं है और दूसरों को पीड़ा देने के समान कोई पाप नहीं है। श्रीकृष्ण ने अपने जीवन से यही सिखाया कि सच्चा धर्म सेवा और दया में निहित है।

नारी शक्ति के बिना समाज की कल्पना अधूरी है। उसके सशक्तिकरण से ही राष्ट्र का विकास संभव है। स्वावलंबन न केवल उसके लिए वरदान है, बल्कि सम्पूर्ण मानवजाति के उत्थान का मार्ग है।

अर्थात्, जहाँ नारी की पूजा होती है, वहाँ देवता निवास करते हैं और जहाँ उनका अपमान होता है, वहाँ सभी कार्य निष्फल हो जाते हैं।

संतों का धर्म केवल ग्रंथ-ज्ञान तक सीमित नहीं है,ऐसा क्रांतिकारी संत ज्ञानेश्वर जी महाराज मानते हैं।  सच्चे संत वे हैं जो समाज में परिवर्तन का दीपक जलाएँ। जब जन्माष्टमी का पर्व संतों के सम्मेलन और सेवा कार्यों के साथ जोड़ा जाए, तो यह उत्सव ग्रामोन्नति का महाकुंभ बन जाता है। संत समाज की भूमिका केवल उपदेश देने तक ही सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि उन्हें समाज के उत्थान के लिए सक्रिय रूप से कार्य करना चाहिए।

अर्थात्, संत का वचन सेवा के मार्ग पर चलना है और भक्ति तभी पूर्ण होती है जब दुखियों का दुख दूर किया जाए।

जन्मोत्सव का उत्सव तभी सार्थक होगा जब यह ग्रामीण समाज की उन्नति, नारी सशक्तीकरण और निर्धन जनों की सेवा से जुड़ा हो। श्रीकृष्ण का सच्चा अनुकरण केवल कथा-वाचन नहीं, बल्कि परोपकार और समाजोत्थान है। आइए, हम इस जन्मोत्सव पर संकल्प लें कि हम श्रीकृष्ण के संदेश को आत्मसात करते हुए सेवा और स्वावलंबन के पथ पर अग्रसर होंगे। गाँव-गाँव तक यह संदेश पहुँचे कि श्रीकृष्ण की भक्ति केवल मंदिरों तक सीमित नहीं, बल्कि सेवा और सहयोग में निहित है।

🌺 हरि ओम तत्सत 🌺

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